Chath Puja

क्यों मनाते हैं छठ पूजा ? कैसे है सही विधि छठ पूजा की?

छठ पर्व को हिंदू धर्म में विशेष स्थान दिया जाता है। यह पर्व शुक्ल पक्ष की पष्ठी को मनाया जाता है। इसे छठ पर्व या षष्ठी पूजा पर्व भी कहा जाता है।

इस पर्व में किसी मूर्ति की पूजा नहीं की जाती। छठ मइया की पूजा से संतान प्राप्ति, संतान की रक्षा और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

छठ मैया को सूर्य देव की बहन कहा जाता है। माना जाता है कि सूर्य देव की दो पत्नियाँ हैं – उषा और प्रत्यूषा। सूर्य की पहली किरण यानी उषा और सूर्य की आखिरी किरण – प्रत्यूषा को अर्घ्य देकर सूर्यदेव की पूजा की जाती है।

यह चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुवात कार्तिक शुक्ल की चतुर्थी को होती है और समाप्ति कार्तिक शुक्ल की सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रत रखने वाले लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं।

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छठ पूजा की ऐतिहासिक शुरुवात

कहते हैं राजा प्रियवंत को कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने उन्हें पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाने का सुझाव दिया था। यज्ञ करवाकर उन्होंने प्रियवंत की पत्नी मालिनी को खीर का प्रसाद दिया।

इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वह पुत्र मृत पैदा हुआ। प्रियवंत मृत पुत्र को लेकर शमशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक़्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना वहां प्रकट हुईं।

उन्होंने राजा को अपनी पूजा करने के लिए प्रेरित किया। पुत्र मोह में राजा प्रियवंत ने षष्ठी की पूजा की और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई।

यह भी माना जाता है कि 14 वर्ष के वनवास से लौटने के पश्चात श्री राम और सीता मैया ने रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि-मुनियों के आदेश पर सूर्य देव के लिए यज्ञ करने का फैसला किया था।

पूजा के लिए उन्होंने मुद्गल ऋषि को आमंत्रित किया था। ऋषि ने सीता मैया पर गंगाजल छिड़क कर उन्हें पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य देव की उपासना करने का आदेश दिया। मुद्गल ऋषि के आश्रम में रहकर सीता मैया ने 6 दिन तक सूर्य देव की पूजा की थी।

यह भी माना जाता है कि छठ पूजा का आरंभ महाभारत काल में हुआ था। सूर्यपुत्र कारण सूर्य देव के सबसे बड़े भक्त थे। वह रोज़ कमर तक पानी में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे, वहीं से इस प्रथा का आरंभ हुआ।

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उत्सव के चार दिन

पहला दिन – नहाए खाए

सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठ व्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण करके व्रत की शुरुआत करती है।

व्रत का खाना कांसे या मिट्टी के बर्तन में बनाया जाता है। भोजन के रूप में कद्दू ,चन्ने की दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। व्रती सिर्फ दिन में एक ही बार खाना खाते हैं। स्वयं भोजन करने के बाद ही घर के अन्य सदस्यों को खाना परोसा जाता है।

दूसरा दिन – खरना

दूसरे दिन व्रती दिन भर उपवास रखने के बाद शाम को भोजन ग्रहण करते हैं। सूर्यास्त से पहले वह जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करती।व्रत के प्रसाद में चावल गुड़ और गन्ने के रस की खीर बनाई जाती है।

प्रसाद में नमक या चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता। इसे खरना कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आसपास के सभी लोगों को आमंत्रित किया जाता है। घी लगी रोटी व चावल का पिट्ठा प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

संध्या अर्घ्य

संध्या अर्ध्य कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। पूजा के प्रसाद के रूप में ठेकुआ व चावल के लड्डू बनाए जाते हैं। बांस की टोकरी में प्रसाद और फूल सजा कर तालाब पर ले जाया जाता है।

सूर्यास्त के समय सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और उसकी पूजा की जाती है। कई जगह इसे टिकरी भी कहा जाता है।

उषा अर्घ्य

चौथे दिन यानी कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सुबह सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। शाम को ‘ ब्रह्मा बाबा ‘ यानी पीपल की पेड़ की पूजा की जाती है ।

व्रत की विधि

इस व्रत को बेहद कठिन माना जाता है। महिलाओं के साथ साथ कई पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। भोजन के साथ इस व्रत में सुखद शय्या का भी त्याग करना पड़ता है।

4 दिनों तक चलने वाले इस छठ पर्व में साफ-सुथरे और नए कपड़े पहनना अनिवार्य माना जाता है। छठ पर्व को शुरू करने के बाद इस व्रत को तब तक रखना पड़ता है जब तक नई पीढ़ी की विवाहित महिला इसके लिए तैयार ना हो जाए। घर में किसी की मृत्यु होने के पश्चात इस पर्व को नहीं मनाया जाता।

  • छठ पूजा की तिथि – २ नवंबर, 2019 शनिवार
  • सूर्य उदय का समय – सुबह 6:30
  • सूर्यास्त समय – शाम 5:35
  • षष्ठी तिथि शुरुवात – 2 नवंबर रात्रि 12:51
  • षष्ठी तिथि समाप्ति – 3 नवंबर रात्रि 1:31
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