RBI governor Shaktikanta Das

आरबीआई से मौद्रिक प्रोत्साहन की उम्मीद लगाई जा सकती है?

हाल ही में हुई प्रेस सम्मेलन में आरबीआई गवर्नर शक्तिकांता दास ने भारत की ढलती अर्थव्यवस्था पर बयान दिया। गवर्नर ने कहा कि अभी भी अधिक दरों पर कटौती होने की गुंजाइश है। उनके इस बयान से मौद्रिक वृद्धि होने की संभावना नज़र आई।

भले ही 6 सदस्यों की इस मौद्रिक नीति समिति का गवर्नर सिर्फ एक हिस्सा हैं परंतु उनके बयान से यह साबित होता है कि अभी कुछ वक्त तक पॉलिसी दरों में कटौती चलती रहेगी।

हाल ही में रिलीज़ किए गए सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था 6 गुना धीमी हो गई है। इसलिए मौद्रिक नीति समिति को कोई भी फैसला लेने से पहले इन आंकड़ों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा।

पिछली मौद्रिक नीति समिति में वित्त मंत्रालय ने भी कई कदम ऐसे उठाए हैं जिनका असर सरकार की अर्थव्यवस्था पर नज़र आ सकता है। बड़ा सवाल ये है कि क्या पॉलिसी दरों में भी कटौती इसी तरह चलती रहेगी? या फिर 110 बीपीएस और अन्य राजकोषीय उपायों के साथ ही आगे बढ़ते हुए अर्थव्यवस्था के पलटने का इंतजार करना चाहिए?

RBI governor Shaktikanta Das

कितनी जगह है आरबीआई के पास?

एक अन्य कॉलम में आईडीएफसी संस्था के रिसर्च डायरेक्टर निरंजन राजाध्यक्षा ने “टेलर नियम” का सुझाव देते हुए कहा कि भारत का रेपो रेट 4% के करीब होना चाहिए।

टेलर नियम धारणाओं पर काम करता है, जो कि हमें एक रेपो रेट तक पहुंचाता है। यह रेट कुछ चरों पर निर्भर करता है जैसे की – तटस्थ ब्याज दर, उत्पादन गाप, मुद्रास्फीति अंतर और विकास और ब्याज को दिए गए बराबर आंकड़ों पर।

क्या वर्तमान 5. 4% रेपो रेट होते हुए भी आरबीआई के पास अधिक दरों में कटौती करने की गुंजाइश है?

रेट कट साइकिल

2007 के वित्तीय संकट के बाद से आरबीआई ने दो स्थानों पर रेट कट के फैसले लिए हैं। अक्टूबर 2007 से अप्रैल 2009 के बीच 7 महीनों में 4.25% का रेट कट देखा गया था, जो कि विश्व में एक बहुत बड़ा वित्तीय झटका साबित हुआ था। उसके पश्चात जनवरी 2015 से शुरू हुए नौ महीनों के बीच भी 125 बीपीएस रेट साइकिल देखा गया था।

रोचक बात यह है कि इस समय भारत की अर्थव्यवस्था 7 परसेंट बढ़ रही थी पर खुदरा महंगाई दर काफी ज़्यादा कम था। जरूरी बात यह है कि 2015 में आरबीआई ने मौद्रिक उत्तेजना तब दी थी जब वृद्धि बढ़ रही थी परंतु मुद्रास्फीति का स्तर टारगेट से नीचे था।

पर वर्तमान अर्थव्यवस्था के इस डूबते दृश्य में आरबीआई की मौद्रिक उत्तेजना ज़्यादा उपयुक्त नज़र आती है।

तरलता और संचरण गतिशीलता

जून 2019 से बैंकिंग सिस्टम में तरलता नज़र आई है जो कि अधिकतर दिनों पर एक लाख करोड़ रूपए रही है। इस अतिरिक्त राशि से हस्तांतरण में कुछ सुधार देखे जाने चाहिए थे, परंतु आंकड़ों के अनुसार ऐसा नहीं देखा गया।

यदि हम सिर्फ ताज़ा ऋण राशियों पर उधार दर को औसत सीमांत लागत से मिला कर देखें और आरबीआई के रेपो रेट से इसकी तुलना करें तो यह सामने आता है कि संचरण का स्तर नीचे गिर गया है।

मात्र दो महीने की अवधि में रेपो रेट 50 बीपीएस कम हो गया था और उधार दर सभी एससीबीएस के लिए 20 बीपीएस व सभी एमसीएलआर के लिए 30 बीपीएस हो गया था।

परंतु आश्चर्य की बात यह है कि जून 2019 से जुलाई 2019 के दौरान सभी नए ऋणों पर उधार दर में बढ़ोतरी नज़र आई है।
बेहतर संचरण के लिए आरबीआई ने खुदरा, सूक्ष्म और लघु उद्यमों पर बाहरी बेंचमर्किंग को अनिवार्य कर दिया गया है। इसे 1 अक्टूबर, 2019 से लागू किया गया है।

उधार की समस्या

लगातार रेट कट और आंशिक नीति संचरण के रूप में मिल रही मौद्रिक उत्तेजना के बावजूद वृद्धिशील बैंक क्रेडिट अभी भी खराब ही है। जुलाई 2019 के सेक्टोरल क्रेडिट डाटा के अनुसार उद्योगों और सेवाओं के वृद्धिशील बैंक क्रेडिट में 3 और 4.5% कर्मानुसार कटौती देखने को मिली है।

गौर करने की बात यह है कम उधार दर, डिमांड की तरफ का मुद्दा है या आपूर्ति विभाग की तरफ का? अगर तो यह तकाजे की तरफ का मुद्दा है फिर तो अर्थव्यवस्था में सुधार देखा जा सकता है। परंतु अगर यह आपूर्ति विभाग के लिए है फिर शायद बैंकों में और कई बदलावों की भी आवश्यकता होगी।

निरंतर की जाने वाली घोषणाओं (मौद्रिक और राजकोषीय) के बाद लगता है सरकार को अब कुछ वक़्त के लिए ठहर जाना चाहिए। अर्थव्यवस्था इस समय एक असफल शिष्य की तरह है जिसे अपने दोनों शिक्षकों- आरबीआई और वित्त मंत्रालय द्वारा एक्स्ट्रा क्लासेस दे दी गई हैं। अब शिक्षकों को बैठकर शिष्य के परिणाम का इंतजार करना चाहिए।

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