अयोध्या मध्यस्थता समिति ने पेश किए सुप्रीम कोर्ट में समझौते के दस्तावेज़

अयोध्या मध्यस्थता समिति ने 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में समझौते के दस्तावेज़ दाखिल किए थे। सूत्रों के अनुसार समझौते की अब तक की सारी बातचीत कोर्ट में जमा करवा दी गई है।

समझौते की फाइलिंग और अयोध्या बेंच की आख़िरी सुनवाई एक साथ ही चल रही है।समझौते से संबंधित पूरी जानकारी को गोपनीय रखा गया है और किसी को भी इसका ज्ञान नहीं है।

16 सितंबर को मध्यस्थों द्वारा कोर्ट में समझौते की बातचीत को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया था। वह चाहते थे कि 70 साल पुराना रामजन्मभूमी- बाबरी मस्जिद के मसले को मित्रभाव से सुलझा लिया जाए।

ज्ञापन के अनुसार पार्टियों द्वारा सुझाव दिया गया था कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के अतिरिक्त समझौते के बातचीत भी चलती रहे।

पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश एफएमआई कलीफुल्ला, आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचु इस पूरे मतभेद के मध्यस्थ हैं। मध्यस्थों ने कहा है कि वार्तालाप को जहां 29 जुलाई को अंत किया गया था, वहीं से अब उसे आगे बढ़ाया जाएगा। 29 जुलाई को भी आखिरी मिनट पर कुछ मतभेदों करके समझौते को रोक दिया गया था।

संविधान पीठ की अगुवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने 2 अगस्त को हुई सुनवाई में कोर्ट को किसी भी फैसले पर पहुंचने में असफल घोषित किया था। इसके पश्चात 6 अगस्त से समझौते की बातचीत आरंभ हो गई थी। अभी तक 20 से ज़्यादा अदालतों में इस मुद्दे की सुनवाई हो चुकी है। पांच न्यायाधीशों द्वारा इन अपीलों को अब रोज़ाना सुना जा रहा है।

समझौते की शुरुवात संविधान पीठ की अगुवाई कर रहे रंजन गोगोई द्वारा 8 मार्च को गई थी। बेंच द्वारा स्पष्ट किया गया था कि यह मतभेद 1500 स्क्वेयर फीट की भूमि के लिए नहीं बल्कि धार्मिक भावनाओं के लिए है।

तीन मेंबरों की इस मध्यस्थता समिति ने यूपी राज्य के फैज़ाबाद जिला में रहने वाले हिस्सेदारों से भी इस मुद्दे को ले कर कई बार बातचीत की है। इस पूरी वार्तालाप को रिकॉर्ड किया गया है और इसे गोपनीय रखने के सख्त कदम उठाए गए हैं।

8 मार्च को पहले कोर्ट द्वारा इस समिति को 8 हफ्तों का समय दिया गया था परंतु 8 मय को समिति ने कोर्ट को बताया था कि अभी भी मुद्दे को सुलझाने के लिए संवाद चल रहे हैं।

कई लोगों द्वारा आलोचनाओं प्राप्त करने के बावजूद भी कोर्ट ने इन्हें 15 अगस्त तक का समय और दिया था। परंतु इस पूरे विषय में नया मोड़ तब आया जब गोपाल सिंह विशाराद द्वारा 1950 में दर्ज किया गया आवेदन सामने आया। इस आवेदन में कहा गया था कि समिति के कार्य में कोई प्रगति नहीं है और कोर्ट को सुनवाई शुरू कर देनी चाहिए।

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